कूर्माचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद, प्रेम नगर शाखा द्वारा आज कुमाऊँ का लोकपर्व सातू-आठू मनाया गया

MY BHARAT TIMES, DEHRADUN/PREMNAGAR, कूर्माचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद, प्रेम नगर शाखा द्वारा आज कुमाऊँ का लोकपर्व सातू-आठू मनाया गया।आज बिरुड़ पंचमी है, बिरुड़ का अर्थ है भीगी हुई दालें और स्थानीय अनाज, जिसमें पंच अनाज गेहूँ, मटर, कलूँ, गुरुंश, चना, आदि शामिल होता है। जिसे दो-तीन दिन भिगाकर आठों के दिन भूनकर प्रसाद स्वरूप खाया जाता है। बिरुड़ गमरा यानि पार्वती का पसंदीदा कल्यो है, भादो मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को वह कैलाश से अपने मायके हिमालय आती है, जिसे इसका भोग लगाया जाता है। लोक में कहा जाता है कि सातों को पार्वती (गमरा दीदी) अपने मायके आती है औऱ आठों को उन्हें लिवा जाने को भगवान शिव आते हैं, जिन्हें महेश्वर भीना (जीजा) कहा जाता है। बिरुड़ पंचमी को गमरा (गौरा) दीदी के आगमन की सूचना माना जाता है। इसलिए उनकी पसंद का कल्यो आज हर घर मे भिगाया जाता है।
शाखा अध्यक्ष हरि सिंह बिष्ट ने बताया की ये लोकपर्व कुमाऊँ में सभी जगह मनाया जाता था, लेकिन अब शहरों में कम ग्रामीण अंचलों में इस लोकपर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। अध्यक्ष ने बताया की अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हमारी शाखा ने बहुत बड़े स्तर से इस पर्व को मनाना शुरु किया जिसमें 100 के आस-पास पुरुष व महिलायें भाग लेती हैं, लेकिन इस बार कोरोना की महामारी को देखतें हुए इस लोक पर्व को सीमित लोगो के साथ मनाया गया। सातों-आंठु का यह लोक उत्सव भादो माह की सप्तमी और अष्टमी को मनाया जाता है। एक तरह से यह वर्षाकालीन उत्सव है जिसमें महिलायें अखंड सौभाग्य की कामना के साथ व्रत रखकर शिव-पार्वती की उपासना करती हैं। इस उत्सव में गौरा-महेश (स्थानीयता भाषा में गवरा मैसर )की गाथा गाई जाती है। देखा जाय तो सातूं-आठूं की यह परंपरा प्रत्यक्षतः हिमालय के प्रकृति- परिवेश और जनमानस से जुड़ी है, गौरा महेश्वर की गाथा में हिमालय की अनेकानेक वनस्पतियों- बांज, देवदार, हिंसालू,घिंगारु, नीबूं, ककड़ी और चीड़ सहित अनेक वन लताओं का मनोहर वर्णन आया है।
पंचमी के दिन पंचधान्य भिगोए जाते हैं, आठूं के दिन अनाज, धतूरे, फल फूलों से गौरा महेश्वर यानी शिव पार्वती की पूजा की जाती है और उनकी गाथा गाई जाती है। रात में जागरण होता है और प्रतीक रूप में शिव-पार्वती की सुदंर प्रतिमायें बनाई जाती हैं। शाम को महिलायें अपनी रंग परंपरागत परिधानों में सज-धज कर गोल परिधि में नाच-गीत करती हैं। महिलायें गौरा-महेश की प्रतिमा को अपने सिर पर रखते हुए आँगन या मंदिर में लाती हैं और गीत गाती हैं। पूजा के बाद में गौरा-महेश्वर की प्रतिमाओं का विसर्जन धारों और नौलों में किया जाता है। इस दौरान गाँव के संजायती खोले में चांचरी का गायन किया जाता है। पहाड़ अपनी अनूठी संस्कृति और लोक पर्वों के लिए ही जाना जाता है।
पहाड़ी क्षेत्र कुमाऊँ में इन दिनों सातूं-आठूं की धूम मची है। सातूं-आठूं पहाड़ की लोक संस्कृति और पर्वों का संवाहक है। इस लोक पर्व में लोककला का प्रदर्शन होता है तो ढोल, हुड़का आदि वाद्ययंत्रों की धमक भी यहाँ देखने को मिलती है। खास बात यह है कि सातूं-आठूं के समय गौरा को पहाड़ की महिलायें अपने बीच की ही आम महिला की तरह देखती हैं। इस त्यौहार को अब शहरों में बेस कुमाऊँ वासियों के द्वारा भी बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाने लगा है। आज के समय में ज्यादातर लोग पहाड़ों से शहरों की तरफ आ गए हैं, जिनमें से कुछ तो अपनी परंपरा को भूल भी गए हैं लेकिन कुछ लोगों और संस्थाओं के द्वारा आज भी अपनी परंपरा को कायम रखने के लिए पूर्ण रूप से प्रयास किये जा रहे हैं, इसलिए हमें अपनी परंपरा को हमेशा याद रखते हुए उनको संजोकर रखना चाहिए ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी देवभूमि की परंपरा का ज्ञान अर्जित कर उसे आगे बढ़ा सके।
