भारतीय संस्कृति में बुराई पर अच्छाई की जीत की ख़ुशी और आपसी भाईचारे को दर्शाता ‘होली’ का पर्व

भारतीय संस्कृति में बुराई पर अच्छाई की जीत की ख़ुशी और आपसी भाईचारे को दर्शाता ‘होली’ का पर्व

MY BHARAT TIMES, DEHRADUN, भारतीय संस्कृति में समय-समय पर विभिन्न प्रकार के त्यौहार मनाये जाते हैं, जिनमें से होली पर्व का एक विशेष स्थान है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बसंत ऋतु में मनाया जाता है। होली के त्यौहार में प्रत्येक व्यक्ति अपने पुराने गमों का भुलाकर हर्षोल्लास के साथ आपस में गले मिलकर खुशी से मनाते हैं। होली के त्यौहार में लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर खुशी का इजहार करते हैं तथा एक-दूसरे के घरों में जाकर होली पर्व की बधाई भी देते हैं। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्यौहार है, इस पर्व को भारत के अलावा हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी मनाया जाता है, साथ ही आज के समय में होली पर्व का पूरे विश्व में अपना स्थान बनता जा रहा है। विश्वभर में आज लोगों के द्वारा होली का त्यौहार मनाया जाता है।

होली का पर्व बृज के साथ ही उत्तराखण्ड के विभिन्न स्थानों में एक महीने पहले से ही मनाया जाता है, बसंत पंचमी के दिन से बैठक होली का चलन शुरू हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ रंगों की फुहार फूट पड़ती है, होली के दिन गुजिया बनाने का भी प्रचलन है, जो कि उस दिन के खास पकवान में माना जाता है, जिसे मावा (खोया) और मैदा से बनाया जाता है, तथा उसमें विभिन्न प्रकार के मेवाओं का भी मिश्रण होता है। हालांकि होली का पर्व ज्यादातर शहरों में दो दिन मनाया जाता है।

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नेहरू कॉलोनी ए ब्लॉक के राजीव पार्क में होलिका दहन

पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते हैं। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है, राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको ऊँचाईयों तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का पर्व आपसी भाईचारे के साथ मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है, होली के एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है, प्राचीन समय में जब हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को मारने के लिये अपनी बहिन होलिका को अग्नि में प्रवेश करने को कहा था, तो उस समय स्वयं होलिका जलकर राख हो गई थी, विष्णु भक्त प्रहलाद बच गये थे। इसी को कहते हैं, बुराई पर अच्छाई की जीत।

आज भी होली के पहले दिन होलिका दहन किया जाता है, और दूसरे दिन होली का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जैसे-जैसे होली का पर्व समीप आता है, हमारा उत्साह भी बढ़ता जाता है। होली का पर्व सही मायने में भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, जिसके रंग अनेकता में एकता को दिखाते हैं, जो हमारे भारत देश में साफ तौर परे देखने को मिलता है। हमारा देश भी अनेकता में एकता का देश है, यहाँ पर भी विभिन्न धर्मों के लोग रहते हुये अपने-अपने पर्व आपस में आपसी ताल-मेल व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। आज देखा जा रहा है कि जैसे-जैसे समय बदल रहा है, लोग होली के त्यौहार की प्रमुखता को भी भूलते जा रहे हैं, और उस दिन भी कुछ लोग अपने हुडदंग से होली के पर्व की गरिमा को ठेस पहुँचाने का प्रयास करते हैं, ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता हो गई है, अन्यथा आने वाले समय में हमारे वंशज इस पर्व की गरिमा को नहीं समझ पायेंगे।

होली के पर्व की भारतीय संस्कृति में अपनी अलग ही पहचान है, जिसे कायम रखना अति आवश्यक है। हालांकि आज भी बुजुर्गों के द्वारा इस पर्व को संजोकर रखा गया है, उत्तराखण्ड में कुमाऊँ की खड़ी होली का अब धीरे-धीरे प्रचलन बढ़ रहा है, जिसे विभिन्न स्थानों पर मनाया जाने लगा है। कुमाऊँ के साथ ही अब यह खडी होली पूरे राज्य में मनाई जाने लगी है, इस खड़ी होली को कायम रखने में विभिन्न संस्थायें अपना योगदान दे रहे हैं। इस कड़ी में उत्तराखण्ड कूर्मांचल सांस्कृतिक परिषद की विशेष भूमिका है, जो आज भी राज्य के विभिन्न स्थानों पर खड़ी होली लोगों के घरों, मंदिरों में तथा विभिन्न स्थानों पर जाकर मना रहे हैं। अब लोगों को भी खड़ी होली का आनंद आने लगा है, और लोग ज्यादा से ज्यादा अपने घरों में होली पर्व के अवसर पर एक महीने पहले से ही होली का त्यौहार मनाने लग जाते हैं, जिसमें विभिन्न टोलियों के द्वारा होली के गीत गाये जाते हैं, और बाद में उस परिवार को शुभाशीष भी दिये जाते हैं। इसके उपरांत उस परिवार के द्वारा चाय, आलू के गुटके, हलवा आदि प्रसाद वितरण किया जाता है, जिसे सभी लोग बड़े ही हर्षोल्लास के साथ ग्रहण करते हैं।

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आकाश शिक्षा एवं सांस्कृतिक विकास समिति ने धूमधाम से मनाई ‘‘ कुमाऊँनी खड़ी एवं बैठक होली ’’—–

शुक्रवार को देवभूमि उत्तराखण्ड की संस्कृति, उल्लास, प्रेम एवं आपसी भाईचारे का प्रतीक रंगों का पर्व ‘होली’ का कार्यक्रम ‘‘ कुमाऊँनी खड़ी एवं बैठक होली ’’ का गायन, घनश्याम चन्द्र जोशी द्वारा अपने आवास, ए-192, नेहरू काॅलोनी में बड़े धूमधाम से मनाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कूर्मांचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद के केन्द्रीय अध्यक्ष कमल रजवार ने की तथा वह इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में परिषद के महासचिव चन्द्रशेखर जोशी एवं आशीष नौटियाल उपस्थित रहे। ‘हमारी पहचान रंगमंच’ संस्था के कला-प्रेमियों द्वारा बहुत ही मनमोहक तरीके से ‘कुमाऊँनी होली’ गायन की जो शानदार प्रस्तुति पेश की गई उसे देखते ही देवभूमि उत्तराखण्ड की अनुपम संस्कृति की छटा दृष्टिगत होने लगी। कार्यक्रम के दौरान पारम्परिक वेशभूषा में सजे होल्यारों द्वारा परम्परागत अंदाज में होली के गीत गाये गये। खड़ी एवं बैठकी होली मुख्य आकर्षण का केंद्र रही।

इस अवसर पर घनश्याम जोशी व निर्मला जोशी ने सभी अतिथियों एवं होल्यारों का अभिनन्दन एवं धन्यवाद करते हुये कहा कि वह समय-समय पर इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को करते रहेंगे, जिससे कि हमारे पूर्वजों द्वारा प्रदत्त संस्कारों, संस्कृति, कला व पौराणिक धरोहरों को हम आने वाली पीढ़ी को सौंप सकें। आधुनिकता के इस दौर में इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आयोजित किया जाना अति आवश्यक है। इस अवसर पर कूर्मांचल परिषद के महासचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रशेखर जोशी ने भी अपने विचार व्यक्त किये तथा कूर्मांचल परिषद द्वारा अपनी संस्कृति को बचाये रखने हेतु किये जा रहे कार्यों की सराहना की। इस ‘‘कुमाऊँनी होली गायन’’ समारोह में कूर्मांचल की धार्मिक एवं सांस्कृति सभ्यता एवं कला का सजीव चित्रण देखने को मिला।

इस अवसर पर सभी उपस्थित लोगों ने कुमाऊँनी होली के गीतों का आनन्द लिया और साथ ही होल्यारों के साथ नाचने और झूमने भी लगे। इसके बाद अंत में होली का प्रसाद पारम्परिक अंदाज में वितरण किया गया तथा होल्यारों द्वारा समस्त जोशी परिवार के साथ-साथ मौहल्ले व प्रदेश के सुख-शांति व समृद्धि के लिये आर्शीवचन दिये। इस अवसर पर सांस्कृतिक सचिव श्रीमती बबीता शाह लोहनी, मदन मोहन जोशी, राकेश गुप्ता, देवेन्द्र बिष्ट, आलोक शर्मा, दीपक धीमान, चन्द्र सिंह रावत, ए॰ पी॰ घिल्डियाल, गीता जोशी, प्रदीप सूदी, कमलेश सूदी, सहित मौहल्ले के अनेक गणमान्य जन, महिलायें एवं बच्चे उपस्थित रहे।